• समाज की दास्तां कहते -कहते सो गए

मनुष्य मुख्य रूप से एक सामाजिक समुदाय का सदस्य हैं , मनुष्य को केवल अपने बारे में चिंतित नहीं होना चाहिए बल्कि समग्र रूप से समाज कल्याण और उसके विकास के लिए भी चिंतित होना चाहिए, ऐसी सोच रखने वाले सामाजिक समरस्ता के अग्रसर स्वर्गीय पचकौड़ी बाबु का जन्म झंझारपुर के नवटोल ग्राम में एक मध्यमवर्गीय परिवार में हुआ था । स्व. झा शुरू से ही समाजिक कार्यों और समाज कल्याण से जुड़े हुए कार्यों में रुचि रखते थे । उन्होंने युवावस्था में ही समाजिक कार्यों से खुद को जोड़ कर समग्र समाज के बारे में सोचने लगे थे ।

उन्होंने अपने जीवन कार्यकाल में अनेको सामाजिक कार्यो में अपना योगदान दिया था । स्व. पचकौड़ी बाबू समाज के उत्थान के लिए प्रत्येक पीड़ित व्यक्ति की सहायता का प्रयत्त्न करते थे । उन्होंने सामाज कल्याण के साथ- साथ राजनीतिक जीवन की भी शुरुवात कांग्रेस कार्यकर्ता के रूप में किया था । उन्होंने अपने कार्यक्षमता ,कार्यकुशलता के बल पर कांग्रेस में भी अपनी अलग पहचान बनाई थी और एक कार्यकर्ता के रूप में कांग्रेस को मजबूत करने में अपना योगदान दिया था । उनका राजनीतिक संबंध उस समय के बिहार कांग्रेस आलाकमान और कई कद्दावर नेता पूर्व केंद्रीय मंत्री स्वर्गीय ललित नारायण मिश्रा एवं पूर्व मुख्यमंत्री स्वर्गीय जगन्नाथ मिश्रा सहित कई अन्य लोगो के साथ था । उन्होंने कांग्रेस संगठन के विभिन्न पदों पर भी अपना योगदान दिया था । उन्होंने अपने जीवन काल में झंझारपुर के कई विकासनात्मक कार्यों में भी अपना योगदान दिया था ।

उन्होंने अपना जीवन सर्वकल्याणार्थ में समर्पित कर दिया था । उनके द्वारा किए गए कार्यों की वजह से ही मृत्यु के 44 साल बाद भी झंझारपुर के कई लोग उन्हें अपने जेहन में याद रखते हैं । लेकिन वह कहते हैं न विधि के विधान को कोई नहीं बदल सकता , समाज की दास्तां कहते – कहते सन 1978 ईस्वी में अल्पआयु में दुनिया को अलविदा कहकर वो खुद सो गये । स्वर्गीय पचकौड़ी बाबू के समाजिक कार्यों के बारे में जितना लिखे उतना कम है । स्वर्गीय पचकौडी़ बाबू हम जैसे कई युवाओं के मार्गदर्शक और प्रेरणा स्त्रोत हैं । ऐसी पुण्यआत्मा की पुण्यतिथि पर शत-शत नमन ।

ई.आशु कुमार झा
(लेखक स्वर्गीय पचकौडी़ झा के पौत्र और जनसंवाद के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं )